कोई तो इन्तहा होगी मेरे प्यार की खुदा, कब तक देगा तू इस कदर हमें सजा, निकाल ले तू इस जिस्म से जान मेरी, या मिला दे मुझ को मेरी दिलरुबा।
वो सिलसिले वो शौक वो ग़ुरबत न रही, फिर यूँ हुआ के दर्द में सिद्दत न रही, अपनी जिंदगी में हो गये मशरूफ वो इतना, कि हमको याद करने कि फुरसत न रही।
जिंदगी के ज़हर को यूँ हँस के पी रहे हैं, तेरे प्यार बिना यूँ ही ज़िन्दगी जी रहे हैं, अकेलेपन से तो अब डर नहीं लगता हमें, तेरे जाने के बाद यूँ ही तन्हा जी रहे हैं।
अजीब सी वेताबी रहती है तेरे बिना, रह भी लेते हैं और रहा भी नहीं जाता।
हमने कब कहा के कीमत समझो तुम हमारी, गर हमे बिकना ही होता तो आज यूँ अकेले न होते।
मेरी आँखों में देख आकर हसरतों के नक्श, ख्वाबों में भी तेरे मिलने की फरियाद करते हैं।
न जाने क्यों खुद को अकेला सा पाया है, हर एक रिश्ते में खुद को गवाया है, शायद कोई तो कमी है मेरे वजूद में, तभी हर किसी ने हमे यूँ ही ठुकराया है।
रात को जब चाँद सितारे चमकते हैं, हम हरदम आपकी याद में तड़पते हैं, आप तो चले गए हो छोड़ के हमको, मगर हम आपसे मिलने को तरसते हैं।
न ढूंढ मेरा किरदार दुनिया की भीड़ में, वफादार तो हमेशा तन्हा ही मिलते हैं।